
वे भंजेविणु एक्कु किउ मणहं ण चारिय विल्लि ।
तहि गुरुवहि हउं सिस्सिणी अण्णहि करमि ण लल्लि ॥174॥
अन्वयार्थ : जिन्होंने दो को मिटाकर एक कर दिया और विषय-कषायरूपी बेल के द्वारा मन की बेलि को चरने नहीं दिया, ऐसे गुरु की में शिष्या हूँ, अन्य किसी की लालसा मैं नहीं करती ।