अग्गइं पच्छइं दहदिहहिं जहिं जोवउं तहिं सोइ ।
ता महु फिट्टिय भंतडी अवसु ण पुच्छइ कोइ ॥175॥
अन्वयार्थ :
आगे-पीछे, दशों दिशाओं में जहाँ मैं देखूँ वहाँ सर्वत्र वही है; बस, अब मेरी भ्रान्ति मिट गई, अन्य किसी से पूछना न रहा ।