जिम लोणु विलिज्जइ पाणियहं तिम जइ चित्तु विलिज्ज ।
समरसि हूवइ जीवडा काइं समाहि करिज्ज ॥176॥
अन्वयार्थ :
जैसे लवण पानी में विलीन हो जाता है, वैसे चित्त चैतन्य में विलीन होने पर जीव समरसी हो जाता है । समाधि में इसके सिवाय और क्या करना है ?