जइ इक्क हि पावीसि पय अंकय कोडि करीसु ।
णं अंगुलि पय पयडणइं जिम सव्वंग य सीसु ॥177॥
अन्वयार्थ : यदि एकबार भी उस चैतन्य-देव के पद को पाऊं तो उसके साथ में अपूर्व क्रीडा करूँ । जैसे कोरे घड़े में पानी की बूँद सर्वांग प्रवेश कर जाती है, वैसे में भी उसके सर्वांग में प्रवेश कर जाऊँ ।