
तित्थइं तित्थ भमंतयहं संताविज्जइ देहु ।
अप्प अप्पा झाइयइं णिव्वाणं पउ देहु ॥178॥
अन्वयार्थ : एक तीर्थ से दूसरे तीर्थ में भ्रमण करनेवाला जीव मात्र देह का संताप करता है । आत्मा में आत्मा को ध्याने से निर्वाणपद की प्राप्ति होती है । अतः हे जीव ! तू आत्मा को ध्याकर निर्वाण की ओर पैर बढ़ा ।