जो पइं जोइउं जोइया तित्थइं तित्थ भमेइ ।
सिउ पइं सिहुं हंहिंडियउ लहिवि ण सक्किउ तोइ ॥179॥
अन्वयार्थ : हे योगी ! जिस पद को देखने के लिये तू अनेक तीर्थों में भ्रमण करता फिरता है, वह शिवपद भी तेरे साथ ही साथ घूमता रहा, फिर भी तू उसे न पा सका ! (क्योंकि तेरे शिवपद को तूने बाहर के तीर्थों में खोजा, परन्तु अन्तर-स्वभाव में दृष्टि न करी ।)