+ गाथा १८१-१९० -
वामिय किय अरू दाहिणिय मज्झइं वहइ णिराम ।
तहिं गामडा जु जोगवइ अवर वसावइ गाम ॥181॥
अन्वयार्थ : हे योगी ! तूने बायीं ओर तथा दाहिनी ओर सर्वत्र इन्द्रिय-विषयरूपी ग्राम बसाये, परन्तु अन्तर को तो सूना रखा.....वहाँ भी एक अन्य (इन्द्रियातीत) नगर को बसा दे ।