अन्वयार्थ : हे देव ! मुझे तुम्हारी चिन्ता है । जब यह मध्याह्न का प्रसार बीत जायगा, तब तू तो सोता रहेगा और यह पाली सूनी पडी रहेगी । (जबतक आत्मा है, तबतक इन्द्रियों की यह नगरी बसी हुई दिखती है; आत्माके चले जाने पर वह सब सुनकार उज्जड़ हो जाता है । अतः विषयों से विमुख होकर आत्मा को साथ लेना चाहिए ।)