तुट्टइ बुद्धि तडत्ति जहिं मणु अंरावणहं जाइ ।
सो सामिय उवएसु कहि अण्णहिं देवहिं काइं ॥183॥
अन्वयार्थ : हे स्वामी ! मुझे कोई ऐसा अपूर्व उपदेश दीजिये कि जिससे मिथ्याबुद्धि तड़ाक से टूट जाय और मन भी अस्तंगत हो जाय । अन्य कोई देव का मुझे क्‍या काम है ?