सयलीकरणु ण जाणियउ पाणियपण्णहं भेउ ।
अप्पापरहु ण मेलयउ गंगडु पुज्जइ देउ ॥184॥
अन्वयार्थ : जो सकली-करन (मंत्र द्वारा शरीर के अंगों व वस्त्र की शुद्धि) को या पानी-पत्र के भेद को नहीं जानता तथा आत्मा का परमात्मा के साथ सम्बन्ध नहीं करता, वह तो पत्थर के टुकडे को देव समझकर पूजता है ।