देहादेवलि सिउ वसइ तुहुं देवलइं णिएहि ।
हासउ महु मणि अत्थि इहु सिद्धें भिक्‍ख भमेहि ॥186॥
अन्वयार्थ : देहरूपी देवालय में तू स्वयं शिव बस रहा है और तू उसे अन्य देवल में ढूँठता फिरता है । अरे! सिद्धप्रभु भिक्षा के लिये भ्रमण कर रहा है -- यह देखकर मुझे हँसी आती है ।