वे छंडेविणु पंथडा विच्चे जाइ अलक्खु ।
तहो फल वेयहो किं पि णउ जइ सो पावइ लक्खु ॥188॥
अन्वयार्थ :
पुण्य तथा पाप दोनों के मार्ग को छोड़कर अलख के अन्दर जाना होता है; उन दोनों का
(पुण्य-पाप का)
कुछ ऐसा फल नहीं मिलता कि जिससे लक्ष्य की प्राप्ति हो ।