जोइय विसमी जोयगइ
मणु वारणहं ण जाइ ।
इंदियविसय जि सुक्खडा
तित्थइं वलि वलि जाइ ॥189॥
अन्वयार्थ : हे योगी ! योग की गति विषम है; मन रोका नहीं जाता और इन्द्रिय-विषयों के सुख में बलि-बलि जाता हुआ फिर फिर इन्द्रिय-विषयों में भ्रमण करता है ।