
बादउ तिहुवणि परिभमइ मुक्कउ पउ वि ण देइ ।
दिक्खु ण जोइय करहुलउ विवरेरउ पउ देइ ॥190॥
अन्वयार्थ : हे योगी ! आश्चर्य की बात देखो ! यह चैतन्य-करभ की गति कैसी विपरीत-विचित्र है ! कि जब वह बंधा हो तब तो तीन-भुवन में भ्रमण करता है और जब छूटा हो, तब तो एक डग भी नहीं भरता ।