बादउ तिहुवणि परिभमइ मुक्कउ पउ वि ण देइ ।
दिक्‍खु ण जोइय करहुलउ विवरेरउ पउ देइ ॥190॥
अन्वयार्थ : हे योगी ! आश्चर्य की बात देखो ! यह चैतन्य-करभ (हाथी का बच्चा अथवा ऊँट) की गति कैसी विपरीत-विचित्र है ! कि जब वह बंधा हो तब तो तीन-भुवन में भ्रमण करता है और जब छूटा (मुक्त) हो, तब तो एक डग भी नहीं भरता । (जगत मे सामान्यतः ऐसा होता है कि ऊँट वगैरह प्राणी जब मुक्त हों, तब चारों तरफ घूमते रहते हैं और जब बंधे हुए हों तब घूम-फिर नहीं सकते । किन्तु यहाँ आत्मा की गति ऐसी विचित्र है कि जब वह कर्म-बन्धन से मुक्त होता है तब तो एक डग भी नहीं चलता-स्थिर ही रहता है और जब बन्धन में बंधा हो तब तो चारों-गति / तीन-लोक में घूमता रहता है।)