+ गाथा १९१-२०० -
संतु ण दीसइ ततु ण वि संसारेहिं भमंतु ।
खंधावारिउ जिउ भमइ अवराडइहिं रहंतु ॥191॥
अन्वयार्थ : अरे रे ! संसार में भ्रमण करते हुए जीव को न सन्त दिखता है ओर न तत्त्व और वह पर की रक्षा का भार अपने कन्धे पर लेकर घूमता फिरता है । इन्द्रिय तथा मनरूपी फौज को साथ लेकर पर की रक्षा के लिये भ्रमण करता है ।