उव्वस वसिया जो करइ वसिया करइ जु सुण्णु ।
वलि किज्जउ तसु जोइयहि जासु ण पाउ ण पुण्णु ॥192॥
अन्वयार्थ :
जो उजाड़ को तो बसाता है और बसे हुए को उजाड़ता है, जिसे न पुण्य है न पाप, अहो ! ऐसे योगी की बलिहारी है ।