
कम्मु पुराइउ जो खवइ अहिणव पेसु ण देइ ।
अणुदिणु झायइ देउ जिणु सो परमप्पउ होइ ॥193॥
विसया सेवइ जो वि परु बहुला पाउ करेइ ।
गच्छइ णरयहं पाहुणउ कम्मु सहाउ लएइ ॥194॥
अन्वयार्थ : जो पुराने कर्मों को खिपाता है, नये कर्मों को आने नहीं देता और प्रतिदिन जिनदेव को ध्याता है, वह जीव परमात्मा बन जाता है ।
तथा दूसरा, जो विषयों का सेवन करता है तथा बहुत पाप करता है, वह कर्म का सहारा लेकर नरक का पहुना बन जाता है ।