देखंताहं वि मूढ वढ रमियइं सुक्खु ण होइ ।
अम्मिए मुत्तहं छिहु लहु तो वि ण विणडइ कोइ ॥196॥
अन्वयार्थ :
हे मूर्ख ! मल-मूत्र का धाम ऐसा यह मलिन शरीर, जिसके देखने से या जिसमें रमने से कहीं सुख तो नहीं होता, तो भी मूढ-लोग कोइ उसको छोड़ते नहीं ।