जिणवरु झायहि जीव तुहुं
विसयकसायहं खोइ ।
दुक्खु ण देक्खहि कहिं मि
वढ अजरामरू पउ होइ ॥197॥
अन्वयार्थ :
हे जीव ! तू जिनवर को ध्या और विषय-कषायों को छोड़ । ऐसा करने से दुःख तेरे को नहीं दिखेगा और तू अजर-अमर पद को पावेगा ।