विसयकसाय चएवि वढ अप्पहं मणु वि धरेहि ।
चूरिवि चउगइ णित्तुलउ परमप्पउ पावेहि ॥198॥
अन्वयार्थ : हे वत्स ! विषय-कषायों को छोड़कर मन को आत्मा में स्थिर कर; ऐसा करने से चार गति को चूर कर तू अतुल परमात्मपद को पावेगा ।