इंदियपसरु णिवारियइं मण जाणहि परमत्थु ।
अप्पा मल्लिवि णाणमउ अवरु विडाविड सत्थु ॥199॥
अन्वयार्थ : रे मन ! तू इन्द्रियों के फैलाव को रोक और परमार्थ को जान । ज्ञानमय आत्मा को छोड़कर अन्य जो कोइ शास्त्र है, वे वितंडावाद हैं ।