विसया चिंति म जीव तुहुं सिवय ण भल्ला होंति ।
सेवंताहं वि महुर वढ पच्छइं दुक्खइं दिंति ॥200॥
अन्वयार्थ : हे जीव ! तू विषयों का चिन्तन मत कर; विषय भले नहीं होते । सेवन करते समय तो वे विषय मधुर लगते है, परन्तु बाद में वे दुःख ही देते हैं ।