+ गाथा २०१-२१० -
विसयकसायहं रंजियउ अप्पहिं चित्तु ण देइ ।
बंधिवि दुक्किययकम्मडा चिरु संसार भमेइ ॥201॥
अन्वयार्थ : जो जीव विषय-कषायों में रंजित होकर आत्मा में चित्त नहीं देता, वह दुष्कृत कर्मों को बाँधकर दीर्घ काल तक संसार में भ्रमण करता है ।