इंदियविसय चएवि वढ करि मोहहं परिचाउ ।
अणुदिणु झावहि परमपउ तो एहउ ववसाउ ॥202॥
अन्वयार्थ : हे वत्स ! इन्द्रिय-विषयों को छोड़, मोह का भी परित्याग कर, अनुदिन परमपद को ध्या; तेरे को भी ऐसा व्यवसाय होगा (तू भी परमात्मा बन जायगा)