णिज्जियसासो णिप्फंदलोयणो मुक्कसयलवावारो ।
एयाइं अवत्थ गओ सो जोयउ णत्थि संदेहो ॥203॥
अन्वयार्थ :
निर्जित श्वास, निस्पंद लोचन ओर सकल व्यापार से मुक्त -- ऐसी अवस्था की प्राप्ति वही योग है, इसमें सन्देह नहीं ।