तुट्टे मणवावारे भग्गे तह रायरोससब्भावे ।
परमप्पयम्मि अप्पे परिट्टिए होइ णिव्वाणं ॥204॥
अन्वयार्थ :
जब मन का व्यापार टूट जाय, राग-रोष का भाव नष्ट हो जाय और आत्मा परमपद में परिस्थित हो जाय, तभी निर्वाण होता है ।