विसया सेवहि जीव तुहुं छंडिवि अप्पसहाउ ।
अण्णइ दुग्गइ जाइसिहि तं एहउ ववसाउ ॥205॥
अन्वयार्थ : रे जीव ! तू आत्मस्वभाव को छोड़कर विषयों का सेवन करता है तो तेरा यह व्यवसाय ऐसा है कि तू दुर्गति में जायगा । (अतः ऐसे दुर्ववसाय को छोड़ ।)