
मंतु ण तंतु ण धेउ ण धारणु ।
ण वि उच्छासह किज्जइ कारणु ॥
एमइ परमसुक्खु॒ मुणि सुव्वइ ।
एही गलगल कासु ण रुच्चइ ॥206॥
अन्वयार्थ : जिसमें न कोइ मंत्र है न तंत्र, न ध्येय है न धारण, श्वासोश्वास भी नहीं है; इनमें से किसी को कारण बनाये बिना ही जो परमसुख है, उसमें मुनि सोते हैं; यह गड़बड़ या कोलाहल उनको नहीं रुचता ।