उववास विसेस करिवि बहु एहु वि संवरु होइ ।
पुच्छइ किं बहु वित्थरिण मा पुच्छिज्जइ कोइ ॥207॥
अन्वयार्थ :
विशेष उपवास करने से
(परमात्मा में बसने से)
अधिक संवर होता है । बहुत विस्तार क्यों पूछता है ? अब किसी से मत पूछ ।