
तउ करि दहविहु धम्मु करि जिणभासिउ सुपसिद्धु ।
कम्महं णिज्जइ एह जिय फुडु अक्खिउ मइं तुज्झु ॥208॥
दहविहु जिणवरभासियउ धम्मु अहिंसासारु ।
अहो जिय भावहि एक्कमणु जिम तोडहि संसारु ॥209॥
अन्वयार्थ : हे जीव ! जिनवर-भाषित सुप्रसिद्ध तप कर, दशविध-धर्म कर; इस रीति से कर्म की निर्जरा कर -- यह स्पष्ट मार्ग मैंने तुझे बता दिया ।
अहो जीव ! जिनवर-भाषित दशविध-धर्म को तथा सारभूत अहिंसा-धर्म को तू एकाग्र मन से इसप्रकार भा जिससे कि तेरा संसार टूट जाय ।