
भवि भवि दंसणु मलरहिउ भवि भवि करउं समाहि ।
भवि भवि रिसि गुरु होइ महु णिहयमणुब्भववाहि ॥210॥
अन्वयार्थ : भव-भव में मेरा सम्यग्दर्शन निर्मल रहो, भव-भव में मैं समाधि धारण करूँ, भव-भव में ऋषि-मुनि मेरे गुरु हों और मन में उत्पन्न होनेवाली व्याधि का निग्रह हो ।