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गाथा २११-२२२
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अणुपेहा बारह वि जिय भाविवि एक्कमणेण ।
रामसीहु मुणि इम भणइ सिवपुरि पाहवि जेण ॥211॥
अन्वयार्थ :
हे जीव ! रामसिंह मुनि ऐसा कहते हैं कि तू बारह अनुप्रेक्षा को एकाग्रमन से इसप्रकार भा कि जिससे शिवपुरी की प्राप्ति हो ।