
सुण्णं ण होइ सुण्णं दीसइ सुण्णं च तिहुवणे सुण्णं ।
अवहरइ पावपुण्णं सुण्णसहावेण गओ अप्पा ॥212॥
अन्वयार्थ : जो शून्य है वह सर्वथा शून्य नहीं है; तीन-भुवन से शून्य होने से वह शून्य दिखता है । ऐसे शून्य-सद्भाव में प्रविष्ट आत्मा पुण्य-पाप का परिहार करता है ।