वेपंथेहि ण गम्मइ वेमुहसूई ण सिज्जए कंथा ।
विण्णि ण हुंति अयाणा इंदियसोक्खं च मोक्खं च ॥213॥
अन्वयार्थ : अरे अजान ! दो पथ में गमन नहीं हो सकता, दो मुखवाली सुइ से कथरी नहीं सिली जाती; वैसे इन्द्रियसुख तथा मोक्ष-सुख, ये दोनों बात एकसाथ नहीं बनती ।