अच्छउ भोयणु ताहं धरि सिद्धु हरेप्पिणु जेत्थु ।
ताहं समउ जय कारियइं ता मेलियइ समत्तु ॥215॥
अन्वयार्थ :
अरे ! उस घर का भोजन रहने दो कि जहाँ सिद्ध का अपवर्णन
(अवर्णवाद)
होता हो । ऐसे
(सिद्ध का अवर्णवाद करनेवाले)
जीवों के साथ जयकार करने से भी सम्यक्त्व मलिन होता है ।