जइ लद्धउ माणिक्कडउ जोइय पुहवि भंमंत ।
बंधिज्जइ णियकप्पडइं जोइज्जइ एक्कंत ॥216॥
अन्वयार्थ : हे योगी ! पृथ्वी पर भ्रमण करते हुए यदि माणिक मिल जाये तो वह अपने कपड़े में बाँध लेना और एकान्त में बैठकर देखना । (संसार-भ्रमण में सम्यक्त्व रत्न को पाकर एकान्त में फिर-फिर उसकी स्वानुभूति करना; लोगो का संग मत करना ।)