वादविवादा जे करहिं जाहिं ण फिट्टिय भंति ।
जे रत्ता गउपावियइं ते गुप्पंत भमंति ॥217॥
अन्वयार्थ : वाद-विवाद करनेवाले की भ्रांति नहीं मिटती । जो अपनी बढाई में तथा महापाप में रक्त हैं, वे भ्रान्त होकर भ्रमण करते रहते हैं ।