कालहिं पवणहिं रविससिहिं चहु एक्कठइं वासु ।
हउं तुहिं पुच्छउ जोइया पहिले कासु विणासु ॥219॥
अन्वयार्थ : काल, पवन, सूर्य तथा चन्द्र -- ये चारों का इकट्ठा वास है । हे योगी ! मैं तुझसे पूछता हूँ कि इनमें से पहले किसका विनाश होगा ?