मुखनासिकयोर्म्मध्ये प्राणान् संचतें सदा ।
आकाशे चरते नित्यं स जीवो तेन जीवति ॥221॥
अन्वयार्थ : मुख और नासिका के मध्य में जो सदा प्राणों का संचार करता है और जो सदा आकाश में विचरता है (प्राणवायु), उसी से जीव जीता है ।