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दृष्टैर्ज्ञातैः श्रुतैर्वा विहितपरिचितैर्निदितैः संस्तुतैश्च,
नीतैः संस्कार कोटिं कथमपि विकृतिं नाशनं संभवं वै ।
स्थूलैः सूक्ष्मैरजीवैरसुनिकरयुतैः खाप्रियैः खप्रियैस्तै-
रन्यैर्द्रव्यैर्न साध्यं किमपि मम चिदानंदरूपस्य नित्यं ॥14॥
देखे सुने जाने बहुत, वेदे प्रशंसा निन्द्य से ।
संस्कार संस्कारहीन व्यय, उत्पाद बादर सूक्ष्म से ॥
चेतन अचेतन इन्द्रियों को, बुरे अच्छे अन्य से ।
मुझ चिदानन्द स्वरूप को, कुछ लाभ नहिं इन सभी से ॥१४॥
अन्वयार्थ : मेरा आत्मा चिदानंद स्वरूप है मुझे पर द्वव्यों से चाहे वे देखे हों, जाने हों, परिचय में आये हों, बुरे हों, भले हों, भले प्रकार संस्कृत हों, विकृत हों, नष्ट हों, उत्पन्न हों, स्थूल हों, सूक्ष्म हों, जड़ हों, चेतन हों, इन्द्रियों को प्रिय हों, वा अप्रिय हों, कोई प्रयोजन नहीं ।