चिद्रूपेण च घातिकर्महननाच्छुद्धेन धाम्ना स्थितं
यस्मादत्र हि वीतरागवपुषो नाम्नापि नुत्यापि च ।
तद्बिंबस्य तदोकसो झगिति तत्कारायकस्यापि च
सर्व गच्छति पापमेति सुकृतं तत्तस्य किं नो भवेत् ॥19॥
जब वीतरागी नाम से, स्तुति से तद्बिम्ब को ।
कर करे मन्दिर शीघ्र ही हों पाप नष्ट सुप्राप्त हों ॥
बहु पुण्य तब शुद्ध तेजमय, चिद्रूप ध्याता को कहो ।
हो उत्तमोत्तम क्या नहीं? घाति करम क्षय सौख्य हो ॥२.१९॥
अन्वयार्थ : शुद्धचिद्रूप के ध्यान से ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय और अंतरायरूप घातिया कर्मों का नाश हो जाता है; क्योंकि वीतराग-शुद्धचिद्रूप का नाम लेने से, उनकी स्तुति करने से तथा उनकी मूर्ति और मन्दिर बनवाने से ही जब समस्त पाप दूर हो जाते हैं और अनेक पुण्यों की प्राप्ति होती है, तब उनके (शुद्धचिद्रूप के) ध्यान करने से तो मनुष्य को क्या उत्तम फल प्राप्त न होगा ?