+ इन लाभों की ज्ञानिओं से पुष्टि -
कोऽसौ गुणोस्ति भुवने न भवेत्तदा यो
दोषोऽथवा क इह यस्त्वरितं न गच्छेत् ।
तेषां विचार्य कथयंतु बुधाश्च शुद्ध-
चिद्रूपकोऽहमिति ये यमिनः स्मरंति ॥20॥
हे बुध! स्वयं सोचो कहो, 'चिद्रूप मैं' शुध ध्यान से ।
वे कौन गुण जो हों नहीं, नहिं मिटें अवगुण कौन वे? ॥२.२०॥
अन्वयार्थ : प्रिय विद्वानों ! आप ही विचार कर कहें, जो मुनिगण 'मैं शुद्धचिद्रूप हूँ' ऐसा स्मरण करने वाले हैं उन्हें उस समय कौनसे तो वे गुण हैं जो प्राप्त नहीं होते और कौनसे वे दोष हैं जो उनके नष्ट नहीं होते ?