
तिष्ठंत्वेकत्र सर्वे वरगुणनिकराः सौख्यदानेऽतितृप्ताः
संभूयात्यंतरम्या घरविधिजनिता ज्ञानजायां तुलायां ।
पार्श्वेन्यस्मिन् विशुद्धा ह्युपविशतु वरा केवला चेति शुद्ध-
चिद्रूपोहंस्मृतिर्भो कथमपि विधिना तुल्यतां ते न यांति ॥21॥
'चिद्रूप मैं हूँ' स्मृति, रख ज्ञान रूपी तुला पर ।
इक ओर दुसरे पर रखो, बहु भाग्य अर्जित अति सुखद ॥
अति-रम्य बहु तृप्ति प्रदा, सब श्रेष्ठ गुण गण सर्वदा ।
'चिद्रूप मैं हूँ' स्मृति से, पर न रंच समानता ॥२.२१॥
अन्वयार्थ : ज्ञान को तराजू की कल्पना कर उसके एक पलड़े में समस्त उत्तमोत्तम गुण, जो भांति-भांति के सुख प्रदान करने वाले हैं, अत्यन्त रम्य और भाग्य से प्राप्त हुये हैं, इकट्ठे रखें और दूसरे पलड़े में अतिशय विशुद्ध केवल 'मैं शुद्ध चिद्रूरूप है' ऐसी स्मृति को रखें तब भी वे गुण शुद्धचिद्रूप की स्मृति की तनिक भी तुलना नहीं कर सकते ।