+ शुद्ध-चित्-रूप में स्थिरता का माहात्म्य -
तीर्थतां भूः पदैः स्पृष्टा नाम्ना योऽघचयः क्षयं ।
सुरौधो याति दासत्वं शुद्धचिद्रक्तचेतसां ॥22॥
नित शुद्ध चिद्रूपत्व ध्याता के चरण स्पर्श से ।
पा तीर्थता भू पापनाशक नाम सुर सेवक बनें ॥२.२२॥
अन्वयार्थ : जो महानुभाव शुद्धचिद्रूप के धारक हैं उसके ध्यान में अनुरक्त हैं, उनके चरणों से स्पर्श की हुई भूमि तीर्थ 'अनेक मनुष्यों को संसार से तारने वाली' हो जाती है । उनके नाम के लेने से समस्त पापों का नाश हो जाता है और अनेक देव उनके दास हो जाते हैं ।