+ उदाहरण द्वारा उपादान-उपादेय संबंध -
शुद्धस्य चित्स्वरूपस्य शुद्धोन्योऽन्यस्य चिंतनात् ।
लोहं लोहाद् भवेत्पात्रं सौवर्णं च सुवर्णतः ॥23॥
ज्यों लोह से हो लोहमय, सौवर्ण पात्र सुवर्ण से ।
त्यों शुद्ध चिद्रूप ध्यान से हो शुद्ध कलुषित अन्य से ॥२.२३॥
अन्वयार्थ : जिसप्रकार लोहे से लोहे का पात्र और स्वर्ण से स्वर्ण का पात्र बनता है, उसीप्रकार शुद्धचिद्रूप की चिन्ता करने से आत्मा शुद्ध और अन्य के ध्यान करने से अशुद्ध होता है ।