+ शुद्ध चित् रूप की प्राप्ति के साधन -
जिनेशस्य स्नानात् स्तुतियजनजपान्मंदिरार्चाविधाना-
च्चतुर्धा दानाद्वाध्ययनखजयतो ध्यानतः संयमाच्च ।
व्रताच्छीलात्तीर्थादिकगमनविधेः क्षांतिमुख्यप्रधर्मात्
क्रमाच्चिद्रूपाप्तिर्भवति जगति ये वांछकास्तस्य तेषां ॥1॥
जिनबिम्ब के प्रक्षाल स्तुति, पूजनादि जाप से ।
जिनगृह बनाने पूजने, आहार आदि दान से ॥
जिनसूत्र अध्ययन ध्यान, संयम शील इन्द्रिय विजय से ।
व्रत तीर्थ यात्रादि गमन, उत्तम क्षमादि धर्म से ॥
इत्यादि बहु विध विशुद्धि पूर्वक निजातम अर्थि को ।
शुद्धात्मा के ध्यान से, चिद्रूप शुद्धि प्राप्त हो ॥३.१॥
अन्वयार्थ : जो मनुष्य श॒द्धचिद्रूप की प्राप्ति करना चाहते हैं उन्हें जिनेन्द्र का अभिषेक करने से, उनकी स्तुति, पूजा और जप करने से, मन्दिर की पूजा और उसके निर्माण से, आहार, औषध, अभय और शास्त्र-चार प्रकार के दान देने से, शास्त्रों के अध्ययन से, इन्द्रियों के विजय से, ध्यान से, संयम से, व्रत से, शील से, तीर्थ आदि में गमन करने से और उत्तम क्षमा आदि धर्मों के धारने से क्रमश: शुद्धचिद्रप की प्राप्ति होती है ।