+ किन्हें ग्रहण करना और किनका त्याग करना -
अनिष्टान् खहृदामर्थानिष्टानपि भजेत्त्यजेत् ।
शुद्धचिद्रूपसद्ध्याने सुधीर्हेतूनहेतुकान् ॥3॥
मन इन्द्रियों को अरुचिकर, पर शुद्ध चिद्रूप ध्यान के ।
हैं हेतु तो लेना उन्हें, विपरीत उनको छोड़ दे ॥३.३॥
अन्वयार्थ : शुद्धचिद्रूप के ध्यान करते समय इन्द्रिय और मन के अनिष्ट पदार्थ भी यदि उसकी प्राप्ति में कारण स्वरूप पड़े तो उनका आश्रय कर लेना चाहिये और इन्द्रिय - मन को इष्ट होने पर भी यदि वे उसकी प्राप्ति में कारण न पड़े - बाधक पड़े तो उन्हें सर्वथा छोड़ देना चाहिये ।