मुंचेत्समाश्रयेच्छुद्धचिद्रूपस्मरणेऽहितं ।
हितं सुधीः प्रयत्नेन द्रव्यादिकचतुष्टयं ॥4॥
नित यत्न पूर्वक छोड़ दे, द्रव्यादि चारों अहितकर ।
यदि शुद्ध चिद्रूप ध्यान में, विपरीत इससे ग्रहण कर ॥३.४॥
अन्वयार्थ : द्र॒व्य, क्षेत्र, काल और भावरूप पदार्थो में जो पदार्थ शुद्धचिद्रूप के स्मरण करने में हितकारी न हो उसे छोड़ देना चाहिये और जो उसकी प्राप्ति में हितकारी हो उसका बड़े प्रयत्न से आश्रय करना चाहिये ।