संगं विमुच्य विजने वसंति गिरिगह्वरे ।
शुद्धचिद्रूपसंप्राप्त्यै ज्ञानिनोऽन्यत्र निःस्पृहाः ॥5॥
नित शुद्ध चिद्रूप प्राप्ति हेतु, सब परिग्रह छोड़ गिरि ।
गह्वर विजन में रहें ज्ञानी, निष्पृही हो नित्य ही ॥३.५॥
अन्वयार्थ : जो मनुष्य ज्ञानी हैं, वे शुद्धचिद्रूप की प्राप्ति के लिये अन्य समस्त पदार्थों में सर्वथा निस्पृह हो समस्त परिग्रह का त्याग कर देते हैं और एकान्त स्थान पर्वत की गुफाओं में जाकर रहते हैं ॥५॥