+ किसी भी कार्य की थोड़ी-सी भी चिन्ता के दुष्परिणाम -
स्वल्पकार्यकृतौ चिंता महावज्रायते ध्रुवं ।
मुनीनां शुद्धचिद्रूपध्यानपर्वत भंजने ॥6॥
ज्यों वज्र पर्वत नष्ट करता, शुद्ध चिद्रूप ध्यान गिरि ।
नाशक जगत के कार्य की, चिन्ता भले अत्यल्प ही ॥३.६॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार वज्र पर्वत को चूर्ण-चूर्ण कर देता है उसी प्रकार जो मनुष्य शुद्धचिद्रूप की चिन्ता करनेवाला है, वह यदि अन्य किसी थोड़े से भी कार्य के लिये जरा भी चिन्ता कर बैठता है तो शुद्धचिद्रूप के ध्यान से सर्वथा विचलित हो जाता है ।